Tuesday, 25 October 2011

भ्रमित स्वामि राम देव!


हे योग के
व्यवसायी बाबा
राम देव,
राजनीति के मर्म
आप जानते है,
उससे अधिक
व्यवसायिक मर्म को
इसलिये तो -
योग शिविर में
गेरूवे आवरण को चूना।

योग का सरलीकरण कर
खुब जुटाया
धन भी जन भी
पर,
हे भ्रमित स्वामि जी,
योग शिविर के भीड़
योग के प्रति उत्सुक हैं
आपके प्रति नहीं।

योग शिविर के आगंतुकों को
अपना ’वोटर’ समझना
आपका भ्रम है,जैस-
हेमा मालिनी और शस्त्रुघ्न के
चूनावी सभा के भीड़
भाजपा के मतदाता नहीं होते
कांग्रेसी गोविंदा के
ठूमकों पर फिदा यूवा
कांग्रेसी ही नहीं होते
वैसे ही
योग शिविर के भीड़ सभी
आपके अनुयायी नहीं होते।

राजनीति बुरी नहीं है
जैसा कि प्रचार किया जाता
बल्की राजनीति तो सर्वोपरि है
डॉक्टर, वकील, इंजिनियर
वैज्ञानिक, कलाकार या बाबा
सबसे ऊपर होता देश
और देश के विधाता नेता।

नेता अच्छा,
तो नीति अच्छा।
नीति अच्छा,
तो ब्यवस्था अच्छी
ब्यवस्था अच्छी तो राज्य सुखी
जनता सुखी, सुरक्षित!

चूनावी राजनीति में
जनता की जिम्मेदारी पहली है।
नेता जनता के प्रतिनिधि होते,
गलत जनता!
गलत नेता।
भ्रष्ट्र जनता!
भ्रष्ट्र नेता।

आप नेता को क्यों कोसें?
असली दोषी तो जनता है।
बहुदलिय चूनावी राजनीति मे
बहूमत को आकर्षित करना
सबकी राजनैतिक चूनौति है।

दिकभ्रमित, अशिक्षित, मजबूर, गरीब
निरूपाय और आकांक्षी-
जनता को शिक्षित करना
ईमानदार नेता की चूनौति है।

पहले भी बहुत आये बाबा
जिसने राजनैतिक बयान ही नहीं दी
ब्यवस्था को प्रभावित किया
जनता को ’बहकाने’ के चलते
सत्ता ने जहर पिलाया
सुकरात को ?
रजनीश तो इसी युग में हुए
जिसने अमेरिका को भी डराया
तुम अरस्तु बन सकते हो
चाणक्य बन सकते हो
सोनिया भी बन सकते हो
पर-
सिकंदर या चंद्रगुप्त नहीं
आज का सिकंदर
 निरिह अशिक्षित
बहुसंख्य भ्रष्ट्र जनता है।

हे जनतंत्र के शुभचिंतक!
खुब भाषण दो
अच्छा भाषण दो
उन्हें शिक्षित करो
इमानदार बनाओ
इस योग्य बनाओ
ऐसी शिक्षा दो
कि-
अपने वोट की किमत जान सके
चंद तात्कालिक लोभ को
संवरन कर सके
एक बोतल दोरू,
दो टूकड़े मांस
या चंद नकदी में
अपना मत किसी गलत -
धूर्त्त नेता को न दे।

पहचान कर सके
अच्छे विचारधारी की-
परख कर सके
इमानदार राजभक्त
नेता का चूनाव कर सके।

भारत को ऐसे ही रहनुमा की
तलाश है,
जो खूद विधायक या सांसद
न बन कर भी
सही नेता की चुनाव में
अपनी ऊर्जा लगा सके।
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समाज में बेटा बेटी की जरूरत पर एक कविता

अगर एक बेटी या बेटा होता,
दुनीयाँ में ये नाता न होता ।

माँ भी होती बाप भी होता,
न भाभी होती न भैया होता,
गर मैं भी अकेला होता,
बहन होती न जीजा होता।

दादी होती दादा भी होता,
न चाची होती न चाचा होता,
गर मेरा बाप अकेला होता,
फुफी होती न फुफा होता।

नानी होती नाना भी होता,
न मामी होती न मामा होता,
गर मेरी माँ अकेली होती,
मौसी होती न मौसा होता।

सास भी होती ससुर भी होता,
न साली होती न साला होता,
गर मेरी बीबी अकेली होती,
मैं भी किसी का जीजा न होता।

अगर एक बेटी या बेटा होता,
दुनीयाँ में ये नाता न होता !!

Sunday, 16 October 2011

लक्ष्मण तुम जंगल क्यों गये?


वन जाने का आदेश
राम को ही हुआ था
सीता कां संग जाना
पती प्रेम तो था,
पर
लक्ष्मण तुम जंगल क्यों गये?
नई नवेली पत्नि
उर्मीला को छोड़?
भाई का प्रेम था
या कुछ और ?
पति का कर्त्तव्य छोड़
लक्ष्मण तुम जंगल क्यों गये?

अगर कहूँ
भाई के प्रेम नहीं
सीता का आकर्षण था
तेरे वन को जाना!
याद करो!
विश्वामित्र के साथ
सीता स्वयंवर में जाना
पूष्प वाटिका में मिलना।

जनक के निराश भरे शब्दों पर
बार-बार तेरा
धनुष भंग केलिए उठना।
मजबूर थे,
विश्वामित्र ने राम को उठाया।

जो काम कर सकते थे
छोटा लक्ष्मण
राम को क्यों उठाया?

घर पहूँच कर भी
उर्मीला को नहीं अपनाया
सीता को ही अपने
अंतस में बसाया।

सीता ने पत्नि धर्म निभाया
पर राम ने पति से अधिक
राज धर्म निभाया।
जनता के बात पर
पत्नि को ठुकराया।

तुम्हारी मंसा तो
सीता भी समझ ली थी
स्वर्ण मृग के चक्कर में
जब राम न वापस आये
लक्ष्मण कह पूकारा
लक्ष्मण के न जाने पर
सीता ने क्या कहा था?

हे लक्ष्मण राम को
वनवास हुआ
सीता पति संग हो ली
तुमने क्या किया
अपनी पत्नि को छोड़ घर मे
सीता का चक्कर लगाया
बोलो लक्ष्मण या सच नहीं?
तो
लक्ष्मण तुम जंगल क्यों गये?
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