शुरू से ही बोकारो के पत्रकार हासिये पर रहे हैं। आज से तीस बर्ष पहले कहीं इससे बेहतर स्थिति थी जब बोकारो से भी दैनिक अखबार निकला करते थे। 1981 में ’अमृत बर्षा’ और ’सरह होगी’ ने बोकारो के युवकों को पत्रकारिता केलिये एक मंच मुहैया कराया। एक निरक्षर छुटभैया नेता से प्रिंटिग उद्योग में आने वाले पारसनाथ तिवारी ने ’मंगलवार’ साप्ताहिक और ’अमृतबर्षा’ दैनिक लम्बे समय तक निकाला। इसके अलावे कई पाक्षिक और अनियमित अखबार प्रकाशित होते थे उस दौर में जिससे यहाँ एक साहित्यकारों एवं लेखकों का टीम भी तैयार होता गया। परीणामस्वरूप कई राष्ट्रीय स्तर के साहित्यकारों का कार्यक्रम बोकारो में हुआ। नये युवक लेखन और पत्रकारिता की ओर रिझते गये।
उस दौर में भी धनबाद का अखबार ’आवाज’ की ही तुती बोलती थी बोकारो में जो प्रबंधन का दलाल सब दिन बना रहा। यहाँ के उनके प्रतिनिधि को आवाज पाण्डे के नाम से आज भी जाना जाता है। पटना से ’आर्यावर्त’ और ’आज’ भी पढ़े जाते थे पर आवाज का स्थानिय समाचारों में सबसे अधिक महत्व था। जब यहाँ से ’अमृतबर्षा’ और सहर होगी छपना शुरू हुआ तो आवाज’ को ही इन दोनों अखबार अपना प्रतिद्वंद्विवि मानते थे। अशोक अश्क, अजय अश्क, कुमार दिनेश सिंह, बिनोद कुमार उस समय के युवा पत्रकार थे। विकास चंद्र महाराज का भी नाम लेना चाहुँगा। अलख मधुप और रामाधार तिवारी राष्ट्रीय अखबारों में लिखते हुये अपने को इनसे सदा उपर उपर समझते रहे। सबसे बड़ी बात उस दौर में रही कि सभी पत्रकारों ने एक-एक अपना अखबार भी निकालना शुरू कर दिया। बोकारो स्टील प्रबंधन की बड़ी मेहरबानी थी उन दिना जिसका प्रमाण है कि किसी भी तरह दो-चार पन्ना का अखबार का प्रस्ताव ले जाने के बाद भी बोकारो पी0आर0ओ0 से एक पृष्ठ विज्ञापन मिल ही जाता था। और तो और एक पुरा ब्लाॅक ही पत्रकारों केलिये आबंटित कर डाला, कब्जा वाला छोड़ कर। अपने चहेते आवाज पाण्डे को तो बोकारो का अपना ’मैक्स’ टेलीफोन भी मुहैया करा दिया था। अस्सी का दशक बोकारो में पत्रकारों के सुनहरे दिन थे।
बोकारो प्रबंधन कितना भी सुविधा मुहैया कराये पर धनबाद के पत्रकार ही जिला संवाददाता का रूतवा रखते थे और बोकारो के पत्रकार अपने को दिन हिन समझते थे उनके सामने इसलिये वे चाहते थे कि जल्द से जल्द बोकारो जिला घोषित हो जाये और सभी जिला संवाददाता बन जायें और इस मोह मे ंवे राजनीति पर उतर आये ेऔर 1985 में लगभग तीन महिने तक चास चेक पोस्ट पर जत्थेवार भुख हड़ताल भी पत्रकार करते रहे। मैं भी एक दिन उनके साथ भुख हड़ताल में रहा था ’अमृतबर्षा’ में मैं भी ’कार्यालय संवाददाता’ के रूप में पत्रकारिता का कखग सिख रहा था।
1 अप्रैल 1991 को बोकारो जिला बना और फिर पत्रकार एक-एक कर जिला संवाददाता बनते गये। ’आज’, प्रभात खबर’ और राँची एक्सप्रेस बोकारो में पढ़ा जाने वाला अखबार था। पटना से छपने वाले अखबारों में एक दिन बाद के समाचार होते थे और दिल्ली के अखबार तो दो दिन पिछे के समाचार देते फिर भी उनके अपने पाठक वर्ग थे इसके बावजुद स्थानिय समाचारों केलिये धनबाद और राँची के अखबारों के साथ-साथ बोकारो के बालीडीह से छपने वाली ’अमृतबर्षा’ और चास से छपने वाली ’सहर होगी’ को एक देखे बिना अखबार पढ़ना अधुरा माना जाता था। जब हिन्दुस्तान राँची से छपना शुरू हुआ तो वह अग्रणि बनता चला गया। धनबाद से ’आज’ सबसे अधिक भड़किला समाचार छापने के कारण अधिक पढ़ा जाने वाला अखबार था जो बाद में ’बिहार आॅब्जर्बर’ के नये अवतार में वह तेवर नहीं बना पाया। धनबाद के अन्य अखबार ’जनमत’ और बाद में ’दैनिक चुनौति’ बोकारो में कोई पहचान नहीं बना पाया।
पहले ’हिन्दुस्तान’ फिर ’दैनिक जागरण’ और ’प्रभात खबर’ अब दैनिक भास्कर आधुनिक मशिनो द्वारा धनबाद से अखबार निकालने आरंभ किये और सबने बोकारो में एक-एक दफ्तर खोल दिया। बदलते बाजारबाद का शिकार होते हुए धनबाद से निकलने वाले सभी अखबारों ने बोकारो केलिये अलग संस्करण निकालने शुरू किये और इस तरह बोकारो से पत्रकारिता का पतन आरंभ हुआ।
’अमृत बर्षा’ 1985 में धनबाद चला गया, फिर पटना और अब दिल्ली। पारसनाथ तिवारी जो बड़ी मुश्किल से हस्ताक्षर भर कर सकते थे से पत्रकारिता से अधिक उम्मीद करना बेमानी होगी। चंद्रिका प्रसाद सिन्हा की टीम अच्छी थी पर बैकवाॅड लाॅबी हाबी रहने के कारण इसका असर अखबार में भी दिखता था।
उस दौर के अच्छे पत्रकार आज इलेक्ट्रोनिक्स मिडिया में सक्रिय हैं। बोकारो के पत्रकार सजावटी समाचार भर लिखने तक का ही हैसियत रखते हैं। कोई भी विवादास्पद और खोज खबर छापने केलिये उन्हें धनबाद संपादकीय सेंसर से गुजरना पड़ता है। सच कहा जाय तो बोकारो में पत्रकारों केलिये स्कोप ही कहाँ है? दिलिप मंडल को भी इन्हीं पंक्ति में पाता अगर वह बोकारो छोड़ दिल्ली नहीं गये होतेे।
आज के दौर में बड़े अखबार का भव्य किन्तु स्थानिय संस्करण छापना ही मैं बोकारो में पत्रकारिता के ह्रास का प्रमुख कारण मानता हूँ। देखते-देखते हिन्दुस्तान,प्रभात खबर, दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर, सब के सब धनबाद से ही बोकारो केलिये अलग संस्करण निकालते चले गये। आखिर कोई अखबार बोकारो से क्यों नहीं छाप रहा है? क्यों पत्रकारिता के मामले में बोकारो की पत्रकारिता धनबाद के पत्रकारों का उपनिवेश बना हुआ है? आज क्यों कोई बड़ा अखबार मालिक बोकारो में मशिन बैठाना नहीं चाहता यह चिंता का बिषय हैै।
होली मुबारक
ReplyDeleteअभी 'प्रहलाद' नहीं हुआ है अर्थात प्रजा का आह्लाद नहीं हुआ है.आह्लाद -खुशी -प्रसन्नता जनता को नसीब नहीं है.करों के भार से ,अपहरण -बलात्कार से,चोरी-डकैती ,लूट-मार से,जनता त्राही-त्राही कर रही है.आज फिर आवश्यकता है -'वराह अवतार' की .वराह=वर+अह =वर यानि अच्छा और अह यानी दिन .इस प्रकार वराह अवतार का मतलब है अच्छा दिन -समय आना.जब जनता जागरूक हो जाती है तो अच्छा समय (दिन) आता है और तभी 'प्रहलाद' का जन्म होता है अर्थात प्रजा का आह्लाद होता है =प्रजा की खुशी होती है.ऐसा होने पर ही हिरण्याक्ष तथा हिरण्य कश्यप का अंत हो जाता है अर्थात शोषण और उत्पीडन समाप्त हो जाता है.