Monday, 11 June 2012

हमें किसी विदेशी भौतिक वादी मार्क्स, लेनीन या माओ की जरूरत ही क्या?


 धर्म के नाम पर पशुओं के बलि दिये जाने पर सवाल पर आज भी पूरोहित द्वारा यही जबाब दिया जाता है कि बलि में प्रयूक्त पशु की आत्मा धार्मिक कर्मकाण्ड में मरने पर उसे सिधे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। प्राचिन भौतिकवादी दार्शनिक चार्वाक ने हजारों बर्ष पहले ही इस कृत्य पर प्रश्न करते हुये कहा था,

’’पशुश्चेन्निहतः स्वर्गं ज्योतिष्टोमे गमिष...्यति। स्वपिता यजमानेन तत्र कस्मान्न हिंस्यते।।

अर्थात- जो यज्ञ में पशु को मार होम से वह स्वर्ग को जाता हो तो यजमान अपने पितादि को मार होम करके स्वर्ग को क्यों नहीं भेजता?

पूरोहित द्वारा श्राद्ध कर्म में ब्राम्हण भोज और उसके नाम पर दान दिये जाने पर सवाल खघ करते हुये कहा,’’

मृतानामपि जन्तूनां श्राद्धं चेत्तृप्तिकारणम्। गच्छतामिह जन्तूनां व्यर्थ पाथेयकल्पनम्।।

अर्थात- जो मरे हुए जीवों का श्राद्ध और तर्पण तृप्तिकारक होता है तो परदेश में जाने वाले मार्ग में निर्वाहार्थ अन्न, वस्त्र और धनादि को क्यों ले जाते हैं? क्योंकि जैसे मृतक के नाम से अर्पण किया हुआ पदार्थ स्वर्ग में पहुँचता है तो परदेश में जाने वालों के लिये उनके संबंधी भी घर में उनके नाम से अर्पण करके देशान्तर में पहुँचा देवें। जो यह नहीं पहुँचता तो स्वर्ग में वह क्यों कर पहुँच सकता है?

इसी बात को और साफ करते हुये वे कहते हैं-

’’स्वर्गस्थिता यदा तृप्ति गच्छेयुस्तत्र दानतः। प्रासादस्योपरिस्थानामत्र कस्मान दीयते।।

अर्थात- जो मर्त्यलोक में दान करने से स्वर्गवासी तृप्त होते तो नीचे देने से घर के ऊपर स्थित पुरूष तृप्त क्यों नहीं होता?

उन्होंने साफ-साफ इसके कारण को स्पष्ट करते हुये कहा है,’’

ततश्च जीवनोपायो ब्राह्मणैविहितस्त्विह। मृतानां प्रेतकार्याणि न त्वन्यद्विद्यते क्वचित्।।

इसलिये यह सब ब्राह्मणों ने अपनी जीविका का उपाय किया है। जो दशगात्रादि मृतकक्रिया करते हैं यह सब उनकी जीविका की लीला है।

सोंचने की बात है कि आज से हजारों बर्ष पूर्व ब्राह्मणों के चालाकी को इतना साफ तौर पर और तिक्ष्णता से प्रहार करते हुये अपनी बात रखी वह आज तक प्रतिष्ठित क्यों नहीं हो पाया? क्यों आज भी हम झुठ और पाखंड में जी रहे हैं? आज हमारे बुद्धिजीवी भौतिकवादी साथी इन प्राचिन विचारकों की वाणी को वर्त्तमान संदर्भ से जोघ् कर क्यों नहीं रख रहे हैं। केवल जाति-पाति का भेद पैदा कर अपनी राजनीति करने से अच्छा होता कि मानवता के कल्याण के लिये इन प्राचिन विशुद्ध ’स्वदेशी चिंतन’ का सहारा लेकर उन ’देशभक्तों’ के ढोंग को स्वदेशी भौतिक वादी चिंतक के नजरिये से जबाब तलब करें। हमें किसी विदेशी भौतिक वादी मार्क्स, लेनीन या माओ की जरूरत ही क्या?

धर्मनिरपेक्षता का मतलब सिधे-सिधे ’धार्मिक वेश्यावृति’ कहना उचित होगा।


धर्मनिरपेक्षता का गलत मतलब लगाया जा रहा है भारत में। धर्मनिरपेक्ष का मतलब होता है धार्मिक मामलों में निरपेक्ष रहना मगर भारत में यह जिस तरह से इस्तेमाल हो रहा है इससे धर्मनिरपेक्षता का मतलब सिधे-सिधे ’धार्मिक वेश्यावृति’ कहना उचित होगा।

एक हिन्दु धर्म का साधारण आदमी मंदिर जायेगा, अपने ढंग से पूजा अर्चना करेगा। एक इस्लामिक मस्ज...िद जायेगा, नमाज पघ्ेगा, रोजा रखेगा और अपने ढंग से इबादत करेगा। एक ईसाइ चर्च जायेगा बाईबल के पद दुहरायेगा और इशु-मरियम के गुण गायेगा। इसी प्रकार सिख, बौद्ध, जैन और अन्य धर्मावलम्बि अपने पारंपरिक ढंग से पूजा अर्चना करते हैं। नास्तिक किसी भी धार्मिक समुदाय से आ सकता है। उसके बाहरी वेष-भूषा भौगौलिक और क्षेत्रीय संस्कार के चलते कुछ भिन्न हो सकते है पर नास्तिक तो नास्तिक ही होता है। नास्तिक का सिधा अर्थ है जिसमें धार्मिक अविश्वास हो, ईश्वर या परमात्मा जैसी किसी अलौकिक सत्ता पर आस्था न हो और कुछ नहीं। हाँ यहाँ धर्म का मतलब हिन्दु, इस्लाम आदि से ही लगाना। धर्म के कोई अन्य परिभाषा बता कर बरगलाने की चेष्टा न करना क्योंकि दुनिया के सारे लोग धर्म को इसी रूप में जानते हैं।

पर मैं देखता हूँ कि अपने को धर्मनिरपेक्ष साबित करने केलिये ’सर्वधर्म समभाव’ के रूप में अपना विशिष्ट ब्यवहार से अचंभित कर देते हैं, मैनें इसे ही धार्मिक वेश्यावृति की संज्ञा दी है। जिस प्रकार वेश्या एक पति के प्रति निष्ठावान न रह कर किसी भी मर्द के साथ सोने में नहीं हिचकती। उसी प्रकार जब कोई व्यक्ति अपने धर्म के अलावे दुसरे धार्मिक अनुष्ठानों में सक्रिय हिस्सा लेता है। उसके कर्मकाण्ड में हिस्सा लेता है तो वह मेरी नजर में   धार्मिक वेश्या का उदाहरण है।

धार्मिक वेश्या का उदाहरण मेरे बिच नगर के एक चर्चित मित्र हैं जो रमजान में महिना भर रोजा रखते हैं, घर में छठ मैया की पूजा भी होती है और पूछे जाने पर वे अपना धर्म बौद्ध बताते।एक हिन्दु को मुसलमान का हित चिंतक होने केलिये गाय खाना जरूरी नहीं है न ही इफतार पाटी का आयोजन करना। मैने तो हिन्दु राजनेता को मुसलमानों के साथ इफतार पाटी में बजाप्ते नमाज पघ्ते देखा है। चद्द्र चघना और गुरू द्वारा में जाकर सर पर कपड़ा बांध माथा टेकना, बौद्धों के बिच जाकर ’धर्मचक्र’ घुमाना।

धार्मिक वेश्यावृति के सबसे अधिक शिकार हमारे राजनेता हैं जो कभी गुरू द्वारे में माथा टेकने चले जाते, वही मुसलमानों के पिर के मजार में चद्दर चघने चले जाते और उनके लिये इफतार पाटी का आयोजन करते। इस मामले में मैंने सुशील मोदी की प्रशंसा की थी जब उन्होंने मुस्लिम टोपी पहने से साफ इंकार कर दिया था। कई नेता तो वोट के चक्कर में गाय और सुअर एक साथ खा लेने में भी नहीं झिझकते!

अपने को मुसलमान, हिन्दु ईसाई या नास्तिक रखते हुये भी सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में मानवहित में काम किया जा सकता है। पर यहाँ धर्मनिरपेक्षता का मतलब सिधा-अर्थ धार्मिक वेश्यावृति को ही मान लिया गया है।

Thursday, 19 January 2012

कभी कभी


कभी कभी

बिक्षुब्ध हो जाता है मन तेरे लिये
कभी-कभी।
आन्दोलित हो उठता है दिल तेरे लिये
कभी-कभी,
हरदम रहता हूँ ख्यालों में तेरे ही,
पर तुफान मचा देता कोई ख्याल
कभी-कभी।

सदन है कि तुम मेरी नहीं हो,
किसी की हो,
भुल जाता यह बात
कभी-कभी।
तोड़ दूँ सारे बंधन को
चला जाऊँ ’उस पार’ मन करता
कभी-कभी।

भर आता है दिल
याद आती हो जब कभी
मचल उठता है दिल तुम्हें पाने को
कभी-कभी।
आँसू बहा लेता
या लिखता एक कविता
कभी-कभी।