’’देखो भाई , अब मै कुछ नहीं कर सकता। इतना समझाने के बाद भी जज के सामने तुम्हारे पिता जी के बयान ने सब गुड़ गोबर कर दिया।’’ वकील की बात सुन कर बूढ़े ने कहा-
’’ हाँ रे, मैं भगवत गीता छू कर कसम खाकर कैसे झूठ बोलता ? मेरा हाथ सड़ नहीं जाता ? धर्म-कर्म से भी बड़ा कुछ होता है ?’’
’’ हाँ बाबु जी, उसके सब गवाह किस तरह गीता पर हाथ रख झूठ पर झूठ बोलते गये, उन सबके हाथ कहाँ सड़ गये ? आपका ही हाथ सड़ता ? अरे यह तो केवल अदालत का नियम है नहीं तो गीता छू कर बयान देने के बाद भी क्यों नाना प्रकार के साक्ष्य की आवष्यकता पड़ती ? अदालत में आपने वकील के बताये बात को ही कहना चाहिये।’’
’’ नहीं बेटा, चाहे कुछ भी हो मैं धार्मिक पूस्तक पर हाथ रख कर झूठ नहीं बोल सकता।’’ पिता की बात सुन कर बेटा ने अपने वकील से झल्ला कर कहा-’’ वकील साहब, आखिर यह ढकोसला क्यों ? क्यों सीधे-साधे लोगों के धार्मिक आस्था के साथ खिलवाड़ किया जाता है ? या तो धार्मिक किताब पर हाथ रख कर कही बात पर कोई जिरह न हो ,उसे ही सच मान लिया जाय ,वरना अदालत में यह ढकोसला बंद हो जाना चाहिये जिससे सीधे-साधे लोग सच बोल कर फंसते जाते हैं और चालाक-धूर्त्त लोग झूठ पर झूठ बोलकर बंचते जाते हैं ।’’
’’ यही सच और झूठ के ऊपर ही तो हम वकीलों की रोजी-रोटी चल रही है। अरे तुम्हारे बातों से तो क्रांति की बू आती है।’’ वकील ने कहा।
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