बाजार नारी का ही है!
देह का बिकना आसान है
मोहक भी,
आनंद भी,
पैसा भी,
बाजार नारी का ही है
मांग भी है,
खरिददार की-
खुशामदी भी।
वे स्पर्श कर ही -
लुट जाते।
स्पर्श क्या
नारी का प्रदर्शन ही काफी है-
देह का।
पैसा ही नहीं,
शोहरत भी,
चहेतों का प्यार
भरपूर प्यार!
एक झलक पर-
लुट जाते
बस!
बाजार नारी का ही है!
देह को रखना है
बाजार में
अच्छे बाजार में
ऊँची दुकानो में
’मिस वर्ल्ड’
’मिस युनिवर्श’
और न जाने-
कितने खिताब भी
मिल जाते यूँ ही
सिर्फ दिखा कर देह!
बाजार नारी का ही है!
फिल्म,
मॉडलिंग
और अभिनय-
के बाजार में,
कला के नाम पर
खुब किती है
इनकी देह!
बाजार नारी का ही है!
वह मार्केट-
पुरूषों का कहाँ?
वह तो बस!
खरिददार ही रहा।
बेवकुफ!
लुटाता है
और बदनाम भी
वही होता है
’नारी शोषक’
जबकि शोषण-
तो उसी का होता है,
बदनाम भी वही करता है
पुरूष!
बाजार नारी का ही है!
डरपोक,
कंजुस,
कुठीत मर्द
बदनाम करते
सामाजिकता का
लबादा ओढ़े,
बेचारे मर्द!
मुफ्त हुये बदनाम!
मारे गये गुलफाम!!
बाजार नारी का ही है!
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