Saturday, 10 September 2011

ईश्वर और प्रेम



प्रेम का जब जक्कर चलता है
साथ-साथ मंदिरों और तां़ित्रको के भी-
चक्कर चलता रहता है।
वह पूजा, आराधाना, ध्यान-त्राटक-
सब करता है,
 प्रेम पात्र के लिये।
अगर प्रेम-पात्र को
 पाने में सफल हुआ,
तो वह आस्तिक हो जाता है।
समझता है-
यह ईश्वर का ही चमत्त्कार है,

अगर वह प्रेम पात्र को पाने में
 असफल रहा-
तो वह नास्तिक हो जाता है,
उसे मंदिरों और तांत्रिकों का चक्कर लगाना,
ध्यान और त्राटक करना व्यर्थ लगता है,

ईश्वर से उसकी आस्था मिट जाती है।

प्रेम में सफलता और असफलता-
ईश्वर की आस्था से
जोर कर देखा जाता है,
इसलिये कहते हैं-

’ईश्वर प्रेम है’ या ’प्रेम ही ईश्वर है।’

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