Saturday, 10 September 2011

नारी केवल तुम बला हो!


ईश्वर की अधुरी कला हो,
कौन कहे अबला तुमको,
हो तुम इतनी सबला कि-
कौन पुरूष न तुमसे छला हो,
नारी केवल तुम बला हो!

प्रकृति से संतुष्ट नहीं तुम
कर ’भ्रू-प्लग’ लगा मेकप
पहने लिबास भड़कीला हो
फिर क्यों न पुरूष मनचला हो
नारी केवल तुम बला हो!

अनी नग्न तस्विर बेंचती
’ब्यूटि-कंटेस्ट’ के बहाने
जीस्म की नुमाइस करती
फिर क्यों न पुरूष मतवाला हो
नारी केवल तुम बला हो!

ममता, करूणा, सलज की मुर्त्ती
होतीं हैं जो होती बेचारियाँ
हो जाती उत्श्रृंखल नारी,
जहाँ पुरूष का वश न चला हो
नारी केवल तुम बला हो!

हाय! पुरूष हृदय उदार,विशाल
उपेक्षित हो भी तुझे कही प्रेरणा
विश्वास किया जीस पुरूष ने
उसके जीवन में जलजला हो
नारी केवल तुम बला हो!

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