Tuesday, 13 September 2011

’प्रेम-पुजारी’ से


                                          ’प्रेम-पुजारी’  से

समाज की सबसे महत्वपूर्ण संस्था है विवाह। विवाह और कुछ नहीं दो नर नारी के शारिरिक संबंध की सामाजिक मान्यता है। मानव समाज में पशुगत सहज काम वृति पर अंकुश लगाने और परिवार का निमार्ण करने हेतु ही विवाह की आवश्यकता महसुस की होगी। प्रेम की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं है। कोई कहता है प्रेम अंधा होता है, कोई कहता है प्रेम में त्याग होता है, कोई प्रेम को ईश्वर से तुलना कर बैठता है तो कोई इसे समाज की उत्श्रृंखलता करार देता है।

समाज में आये दिन जवान लड़का-लड़की के प्रेम के चक्कर में मौत की खबर मिलती रहती है। यह खबर किसी को नहीं गुदगुदाता यह उसी प्रकार सहज और सरसरी तौर पर सिर्फ समाचार शिर्षक पढ़ आगे बढ़ने जैसी ही होती है जैसे आये दिन होने वाली सड़क दूर्घटना की खबर। लेकिन जब यही प्रेम का चक्कर किसी चर्चित व्यक्ति के साथ हो तो समाचार नजर गड़ा कर पढ़ने लायक हो जाती है। पिछले बार जब छत्तीस गढ़ के बड़े नेता अजित जोगी की बेटी प्रेम प्रसंग में मौत हुई तो देश भर में चर्चा हुई। अभी हाल में झारखंड के कोडरमा के एक साधारण परिवार की लड़की की मौत हुई प्रेम प्रसंग में और वह अखबार तथा टी0वी0 चैनलों में सुर्खीयाँ बटोरी हुई है। भला क्यों न हो वह भले एक बड़े नेता या उद्योगपति की बेटी न हो वह थी तो एक पत्रकार ही और उसके प्रेमि भी तो ठहरे पत्रकार और भला अपने ही बिरादरी के पक्ष में तमाम अखबार और चैनल क्यों न खड़े हों? उन्हें तो चाहिये एक लोक रूची का ऐसा मशाला जिसे चाहे जितने चटखारे के साथ परोसा जाय।

कहा जाता है कि भगत सिंह परोस में पैदा हो। अर्थात भगत सिंह जैसा जोखिम भरा काम कोई अपने बेटे से नहीं करवाना चाहता। उसी प्रकार जब समाज में किन्हीं प्रेम प्रसंग की चर्चा होती है तो तमाम पत्रकार और सामाजिक कर्त्ता प्रेम-पुजारी हो जाते हैं और उसके पक्ष में बयान देना आरंभ कर देते हैं। उस लड़के या लड़की के माता-पिता और परिजन को ’विलेन’ के रूप में रख आलोचना करना शुरू कर देते हैं। उसी तरह जैसे परोस के क्रांतिवीर भगत सिंह की तारिफ करते नहीं थकते। मैं उन तमाम पत्रकारों से पुछना चाहता हूँ कि वे अपने भाई, बहन और बेटे बेटियों को क्या इसी प्रकार छुट देंगें जैसा कि वकालत किन्हीं प्रेम प्रसंग के संदर्भ में अपने विचार व्यक्त करते हैं ? अपवाद को छोड़ कर इसका जबाब नकारात्मक आयेगा। और अपवाद से समाज नहीं चलता।

एक मा-बाप कितने ही लाड़ प्यार और कठिनाई से बच्चे हो पाल पोस कर बड़ा करता है, उसे उच्च शिक्षा केलिए कितने आकांक्षाएँ संजोये बाहर भेजता है।  अपने बच्चे के प्रति क्या केवल कर्त्तव्य निर्वाह के ही पक्षधर हैं आप ? क्या माता-पिता का अपने बच्चों से मान-सम्मान की अपेक्षा करना गलत है ? अगर ऐसा है तो फिर क्यों कोई माता-पिता अपने बच्चे के ऊपर इतना कुछ करे ?

समाज में प्रेम विवाह शुरू से होते आया है लेकिन सब दिन उसे असामान्य रूप में ही देखा गया है भले बाद में कुछ विवाह सफल भी हो जाते हैं। बिना माता-पिता के सहमति से विवाह किसी दृष्टि से सामाजिक नहीं है और बस चले तो माता-पिता को वैसे बच्चे से अपने को न केवल सामाजिक रूप से अलग कर लेना चाहिए वरन वैसी कानुनन अधिकार होना चाहिए कि वे अपने उन नालायक बच्चे से उसके उपर किये खर्च की वसुली भी कर सके।

मैं तमाम ’प्रेम-पुजारी’पत्रकार बन्धुओं से पुछना चाहता हूँ कि वे प्रेम, उत्श्रृंखलता, आवारार्दी, ऐयास्सी और बचपना में फर्क करना सिखें। अगर सहज पशुगत आकर्षण को ही प्रेम की संज्ञा दे दी जाय तो फिर एक आवारागर्द बलात्कारी को कैसे गलत कह सकते हैं ? वह भी तो सहज आकर्षण में आकर ही बलात्कार करता है। और आदिम काल में बलात्कार कोई अपराध नहीं माना जाता था। क्या आप समाज को वैसी ही आदिम युग की ओर ढकेलना चाहते हैं ?

हालफिलहाल में घटित एक ऐसे प्रेम-प्रसंग की चर्चा करना चाहता हूँ जो किसी अखबार में नही छपी है। एक लड़की एक दस बर्ष पूत्र के पिता के साथ भाग जाती है और कई दिनों के बाद उस मर्द के साथ घर लौटती है। खबर पाकर उसकी पत्नी और परिजन लड़की के यहाँ आते हैं लड़की को छिपा कर लड़के को भगा दी जाती है। पत्नी पूलिस में रपट लिखवाती है अपने पति के साथ उस लड़की और उसके बाप-भाई के खिलाफ। पुलिस लड़का-लड़की को पकड़ जेल भेज देती है और लड़की के बाप-भाई पुलिस के डर से मारे-मारे फिरते रहे जब तक की उनकी बेल न हो गया।

इतना कुछ होने के बाद भी लड़की के बाप और भाई को लड़की के प्रति शिकायत नहीं और    वे लड़की से दुरी बनाये रखने का दिखावा केवल इसलिए कर रहे हैं क्यों कि कोर्ट में केस है। पत्रकार      बंधु आप के नजर में शायद यह एक आदर्श पिता का उदाहरण होगा इसलिए इसकी चर्चा की।

लड़के-लड़कियों में यह उदंडता और उसका आप जैसे बुद्धिजिवि का समर्थन समाज में क्या संदेश दे रहा है इसका भी आंकलन करें आप, कि कैरियर और स्टेटस के चक्कर में यह हम भुल जाते हैं कि सेक्स एक सहज वृति है और एक उम्र के साथ इसकी भी आवश्यकता पड़ती है जिसे हर कोई कविता लिखकर पेंटिंग कर अथवा योग-ध्यान कर तो दबा नहीं सकता उसका सहज प्रदर्शन तो एक विपरित लिंगी के साथ ही संभव है और वह सामने जो मिल जाय। जब कोई पारिवारिक रूकावट न हो तब तो इसे परवान चढ़ना आसान हो ही जाता है। अब माता-पिता क्या फिर बाल विवाह की ओर उन्मुख हों ?

बिना लाग लपेट के एक बात साफ-साफ कहना चाहता हूँ कि एक बच्चे को नवजात अवस्था से लेकर उच्च शिक्षित करने में एक मा-बाप जितना कुछ करता है उसमें प्रेम और त्याग दोनो समाहित रहता है और साथ ही अपेक्षा भी कि वह उसका नाम रोशन करे वैसे में कोई एक लड़की या लड़का के ’प्रेम’ में पर पच्चीस-तीस बर्ष के मा-बाप के प्यार को भुला कर उसके सामाजिक प्रतिष्ठा को धता बता कर एक चंद दिन से संपर्क में आये ’प्रेमि’ के साथ हो ले यह कैसा न्याय है ? माता-पिता को ऐसे नालायक पुत्र या पुत्री को जहर देकर मारने का कानुनन हक होना चाहिये जिस जगह उसे आज गुनाहगार ठहराया जा रहा है।एक बार उनके माता-पिता के भावनाओं को भी समझने का जहमत उठायें।

वासना और आकर्षण में की गई नादानी को ’प्रेम’ कह कर उसे प्रोत्साहित करना सामाजिक अपराध है जिसकी सजा भारतीय संविधान में नहीं है। कमसे कम ऐसे घटना पर टिपण्णी करते वक्त उसे अपने और अपने परिवार के सदस्य को सामने रख देख लें कि क्या ऐसा ही घटना अपने ऊपर घटित होने पर आप क्या प्रतिक्रिया करेंगे ?

’आकाश खूँटी’

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