Monday, 18 February 2013

बोकारो के पत्रकार हासिये पर रहे हैं।


शुरू से ही बोकारो के पत्रकार हासिये पर रहे हैं। आज से तीस बर्ष पहले कहीं इससे बेहतर स्थिति थी जब बोकारो से भी दैनिक अखबार निकला करते थे। 1981 में ’अमृत बर्षा’ और ’सरह होगी’ ने बोकारो के युवकों को पत्रकारिता केलिये एक मंच मुहैया कराया। एक निरक्षर छुटभैया नेता से प्रिंटिग उद्योग में आने वाले पारसनाथ तिवारी ने ’मंगलवार’ साप्ताहिक और ’अमृतबर्षा’ दैनिक लम्बे समय तक निकाला। इसके अलावे कई पाक्षिक और अनियमित अखबार प्रकाशित होते थे उस दौर में जिससे यहाँ एक साहित्यकारों एवं लेखकों का टीम भी तैयार होता गया। परीणामस्वरूप कई राष्ट्रीय स्तर के साहित्यकारों का कार्यक्रम बोकारो में हुआ। नये युवक लेखन और पत्रकारिता की ओर रिझते गये।

उस दौर में भी धनबाद का अखबार ’आवाज’ की ही तुती बोलती थी बोकारो में जो प्रबंधन का दलाल सब दिन बना रहा। यहाँ के उनके प्रतिनिधि को आवाज पाण्डे के नाम से आज भी जाना जाता है। पटना से ’आर्यावर्त’ और ’आज’ भी पढ़े जाते थे पर आवाज का स्थानिय समाचारों में सबसे अधिक महत्व था। जब यहाँ से ’अमृतबर्षा’ और सहर होगी छपना शुरू हुआ तो आवाज’ को ही इन दोनों अखबार अपना प्रतिद्वंद्विवि मानते थे। अशोक अश्क, अजय अश्क, कुमार दिनेश सिंह, बिनोद कुमार उस समय के युवा पत्रकार थे। विकास चंद्र महाराज का भी नाम लेना चाहुँगा। अलख मधुप और रामाधार तिवारी राष्ट्रीय अखबारों में लिखते हुये अपने को इनसे सदा उपर उपर समझते रहे। सबसे बड़ी बात उस दौर में रही कि सभी पत्रकारों ने एक-एक अपना अखबार भी निकालना शुरू कर दिया। बोकारो स्टील प्रबंधन की बड़ी मेहरबानी थी उन दिना जिसका प्रमाण है कि किसी भी तरह दो-चार पन्ना का अखबार का प्रस्ताव ले जाने के बाद भी बोकारो पी0आर0ओ0 से एक पृष्ठ विज्ञापन मिल ही जाता था। और तो और एक पुरा ब्लाॅक ही पत्रकारों केलिये आबंटित कर डाला, कब्जा वाला छोड़ कर। अपने चहेते आवाज पाण्डे को तो बोकारो का अपना ’मैक्स’ टेलीफोन भी मुहैया करा दिया था। अस्सी का दशक बोकारो में पत्रकारों के सुनहरे दिन थे।

बोकारो प्रबंधन कितना भी सुविधा मुहैया कराये पर धनबाद के पत्रकार ही जिला संवाददाता का रूतवा रखते थे और बोकारो के पत्रकार अपने को दिन हिन समझते थे उनके सामने इसलिये वे चाहते थे कि जल्द से जल्द बोकारो जिला घोषित हो जाये और सभी जिला संवाददाता बन जायें और इस मोह मे ंवे राजनीति पर उतर आये ेऔर 1985 में लगभग तीन महिने तक चास चेक पोस्ट पर जत्थेवार भुख हड़ताल भी पत्रकार करते रहे। मैं भी एक दिन उनके साथ भुख हड़ताल में रहा था  ’अमृतबर्षा’ में मैं भी ’कार्यालय संवाददाता’ के रूप में पत्रकारिता का कखग सिख रहा था।

1 अप्रैल 1991 को बोकारो जिला बना और फिर पत्रकार एक-एक कर जिला संवाददाता बनते गये। ’आज’, प्रभात खबर’ और राँची एक्सप्रेस बोकारो में पढ़ा जाने वाला अखबार था। पटना से छपने वाले अखबारों में एक दिन बाद के समाचार होते थे और दिल्ली के अखबार तो दो दिन पिछे के समाचार देते फिर भी उनके अपने पाठक वर्ग थे इसके बावजुद स्थानिय समाचारों केलिये धनबाद और राँची के अखबारों के साथ-साथ बोकारो के बालीडीह से छपने वाली ’अमृतबर्षा’ और चास से छपने वाली ’सहर होगी’ को एक देखे बिना अखबार पढ़ना अधुरा माना जाता था। जब हिन्दुस्तान राँची से छपना शुरू हुआ तो वह अग्रणि बनता चला गया। धनबाद से ’आज’ सबसे अधिक भड़किला समाचार छापने के कारण अधिक पढ़ा जाने वाला अखबार था जो बाद में ’बिहार आॅब्जर्बर’ के नये अवतार में वह तेवर नहीं बना पाया। धनबाद के अन्य अखबार ’जनमत’ और बाद में ’दैनिक चुनौति’ बोकारो में कोई पहचान नहीं बना पाया।

पहले ’हिन्दुस्तान’ फिर ’दैनिक जागरण’ और ’प्रभात खबर’ अब दैनिक भास्कर आधुनिक मशिनो द्वारा धनबाद से अखबार निकालने आरंभ किये  और सबने बोकारो में एक-एक दफ्तर खोल दिया। बदलते बाजारबाद का शिकार होते हुए धनबाद से निकलने वाले सभी अखबारों ने बोकारो केलिये अलग संस्करण निकालने शुरू किये और इस तरह बोकारो से पत्रकारिता का पतन आरंभ हुआ।

’अमृत बर्षा’ 1985 में धनबाद चला गया, फिर पटना और अब दिल्ली। पारसनाथ तिवारी जो बड़ी मुश्किल से हस्ताक्षर भर कर सकते थे से पत्रकारिता से अधिक उम्मीद करना बेमानी होगी। चंद्रिका प्रसाद सिन्हा की टीम अच्छी थी पर बैकवाॅड  लाॅबी हाबी रहने के कारण इसका असर अखबार में भी दिखता था।

उस दौर के अच्छे पत्रकार आज इलेक्ट्रोनिक्स मिडिया में सक्रिय हैं। बोकारो के पत्रकार सजावटी समाचार भर लिखने तक का ही हैसियत रखते हैं। कोई भी विवादास्पद और खोज खबर छापने केलिये उन्हें धनबाद संपादकीय सेंसर से गुजरना पड़ता है। सच कहा जाय तो बोकारो में पत्रकारों केलिये स्कोप ही कहाँ है? दिलिप मंडल को भी इन्हीं पंक्ति में पाता अगर वह बोकारो छोड़ दिल्ली नहीं गये होतेे।

आज के दौर में बड़े अखबार का भव्य किन्तु स्थानिय संस्करण छापना ही मैं बोकारो में पत्रकारिता के ह्रास का प्रमुख कारण मानता हूँ। देखते-देखते हिन्दुस्तान,प्रभात खबर, दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर, सब के सब धनबाद से ही बोकारो केलिये अलग संस्करण निकालते चले गये। आखिर कोई अखबार बोकारो से क्यों नहीं छाप रहा है? क्यों पत्रकारिता के मामले में बोकारो की पत्रकारिता धनबाद के पत्रकारों का उपनिवेश बना हुआ है? आज क्यों कोई बड़ा अखबार मालिक बोकारो में मशिन बैठाना नहीं चाहता यह चिंता का बिषय हैै।

Monday, 11 June 2012

हमें किसी विदेशी भौतिक वादी मार्क्स, लेनीन या माओ की जरूरत ही क्या?


 धर्म के नाम पर पशुओं के बलि दिये जाने पर सवाल पर आज भी पूरोहित द्वारा यही जबाब दिया जाता है कि बलि में प्रयूक्त पशु की आत्मा धार्मिक कर्मकाण्ड में मरने पर उसे सिधे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। प्राचिन भौतिकवादी दार्शनिक चार्वाक ने हजारों बर्ष पहले ही इस कृत्य पर प्रश्न करते हुये कहा था,

’’पशुश्चेन्निहतः स्वर्गं ज्योतिष्टोमे गमिष...्यति। स्वपिता यजमानेन तत्र कस्मान्न हिंस्यते।।

अर्थात- जो यज्ञ में पशु को मार होम से वह स्वर्ग को जाता हो तो यजमान अपने पितादि को मार होम करके स्वर्ग को क्यों नहीं भेजता?

पूरोहित द्वारा श्राद्ध कर्म में ब्राम्हण भोज और उसके नाम पर दान दिये जाने पर सवाल खघ करते हुये कहा,’’

मृतानामपि जन्तूनां श्राद्धं चेत्तृप्तिकारणम्। गच्छतामिह जन्तूनां व्यर्थ पाथेयकल्पनम्।।

अर्थात- जो मरे हुए जीवों का श्राद्ध और तर्पण तृप्तिकारक होता है तो परदेश में जाने वाले मार्ग में निर्वाहार्थ अन्न, वस्त्र और धनादि को क्यों ले जाते हैं? क्योंकि जैसे मृतक के नाम से अर्पण किया हुआ पदार्थ स्वर्ग में पहुँचता है तो परदेश में जाने वालों के लिये उनके संबंधी भी घर में उनके नाम से अर्पण करके देशान्तर में पहुँचा देवें। जो यह नहीं पहुँचता तो स्वर्ग में वह क्यों कर पहुँच सकता है?

इसी बात को और साफ करते हुये वे कहते हैं-

’’स्वर्गस्थिता यदा तृप्ति गच्छेयुस्तत्र दानतः। प्रासादस्योपरिस्थानामत्र कस्मान दीयते।।

अर्थात- जो मर्त्यलोक में दान करने से स्वर्गवासी तृप्त होते तो नीचे देने से घर के ऊपर स्थित पुरूष तृप्त क्यों नहीं होता?

उन्होंने साफ-साफ इसके कारण को स्पष्ट करते हुये कहा है,’’

ततश्च जीवनोपायो ब्राह्मणैविहितस्त्विह। मृतानां प्रेतकार्याणि न त्वन्यद्विद्यते क्वचित्।।

इसलिये यह सब ब्राह्मणों ने अपनी जीविका का उपाय किया है। जो दशगात्रादि मृतकक्रिया करते हैं यह सब उनकी जीविका की लीला है।

सोंचने की बात है कि आज से हजारों बर्ष पूर्व ब्राह्मणों के चालाकी को इतना साफ तौर पर और तिक्ष्णता से प्रहार करते हुये अपनी बात रखी वह आज तक प्रतिष्ठित क्यों नहीं हो पाया? क्यों आज भी हम झुठ और पाखंड में जी रहे हैं? आज हमारे बुद्धिजीवी भौतिकवादी साथी इन प्राचिन विचारकों की वाणी को वर्त्तमान संदर्भ से जोघ् कर क्यों नहीं रख रहे हैं। केवल जाति-पाति का भेद पैदा कर अपनी राजनीति करने से अच्छा होता कि मानवता के कल्याण के लिये इन प्राचिन विशुद्ध ’स्वदेशी चिंतन’ का सहारा लेकर उन ’देशभक्तों’ के ढोंग को स्वदेशी भौतिक वादी चिंतक के नजरिये से जबाब तलब करें। हमें किसी विदेशी भौतिक वादी मार्क्स, लेनीन या माओ की जरूरत ही क्या?

धर्मनिरपेक्षता का मतलब सिधे-सिधे ’धार्मिक वेश्यावृति’ कहना उचित होगा।


धर्मनिरपेक्षता का गलत मतलब लगाया जा रहा है भारत में। धर्मनिरपेक्ष का मतलब होता है धार्मिक मामलों में निरपेक्ष रहना मगर भारत में यह जिस तरह से इस्तेमाल हो रहा है इससे धर्मनिरपेक्षता का मतलब सिधे-सिधे ’धार्मिक वेश्यावृति’ कहना उचित होगा।

एक हिन्दु धर्म का साधारण आदमी मंदिर जायेगा, अपने ढंग से पूजा अर्चना करेगा। एक इस्लामिक मस्ज...िद जायेगा, नमाज पघ्ेगा, रोजा रखेगा और अपने ढंग से इबादत करेगा। एक ईसाइ चर्च जायेगा बाईबल के पद दुहरायेगा और इशु-मरियम के गुण गायेगा। इसी प्रकार सिख, बौद्ध, जैन और अन्य धर्मावलम्बि अपने पारंपरिक ढंग से पूजा अर्चना करते हैं। नास्तिक किसी भी धार्मिक समुदाय से आ सकता है। उसके बाहरी वेष-भूषा भौगौलिक और क्षेत्रीय संस्कार के चलते कुछ भिन्न हो सकते है पर नास्तिक तो नास्तिक ही होता है। नास्तिक का सिधा अर्थ है जिसमें धार्मिक अविश्वास हो, ईश्वर या परमात्मा जैसी किसी अलौकिक सत्ता पर आस्था न हो और कुछ नहीं। हाँ यहाँ धर्म का मतलब हिन्दु, इस्लाम आदि से ही लगाना। धर्म के कोई अन्य परिभाषा बता कर बरगलाने की चेष्टा न करना क्योंकि दुनिया के सारे लोग धर्म को इसी रूप में जानते हैं।

पर मैं देखता हूँ कि अपने को धर्मनिरपेक्ष साबित करने केलिये ’सर्वधर्म समभाव’ के रूप में अपना विशिष्ट ब्यवहार से अचंभित कर देते हैं, मैनें इसे ही धार्मिक वेश्यावृति की संज्ञा दी है। जिस प्रकार वेश्या एक पति के प्रति निष्ठावान न रह कर किसी भी मर्द के साथ सोने में नहीं हिचकती। उसी प्रकार जब कोई व्यक्ति अपने धर्म के अलावे दुसरे धार्मिक अनुष्ठानों में सक्रिय हिस्सा लेता है। उसके कर्मकाण्ड में हिस्सा लेता है तो वह मेरी नजर में   धार्मिक वेश्या का उदाहरण है।

धार्मिक वेश्या का उदाहरण मेरे बिच नगर के एक चर्चित मित्र हैं जो रमजान में महिना भर रोजा रखते हैं, घर में छठ मैया की पूजा भी होती है और पूछे जाने पर वे अपना धर्म बौद्ध बताते।एक हिन्दु को मुसलमान का हित चिंतक होने केलिये गाय खाना जरूरी नहीं है न ही इफतार पाटी का आयोजन करना। मैने तो हिन्दु राजनेता को मुसलमानों के साथ इफतार पाटी में बजाप्ते नमाज पघ्ते देखा है। चद्द्र चघना और गुरू द्वारा में जाकर सर पर कपड़ा बांध माथा टेकना, बौद्धों के बिच जाकर ’धर्मचक्र’ घुमाना।

धार्मिक वेश्यावृति के सबसे अधिक शिकार हमारे राजनेता हैं जो कभी गुरू द्वारे में माथा टेकने चले जाते, वही मुसलमानों के पिर के मजार में चद्दर चघने चले जाते और उनके लिये इफतार पाटी का आयोजन करते। इस मामले में मैंने सुशील मोदी की प्रशंसा की थी जब उन्होंने मुस्लिम टोपी पहने से साफ इंकार कर दिया था। कई नेता तो वोट के चक्कर में गाय और सुअर एक साथ खा लेने में भी नहीं झिझकते!

अपने को मुसलमान, हिन्दु ईसाई या नास्तिक रखते हुये भी सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में मानवहित में काम किया जा सकता है। पर यहाँ धर्मनिरपेक्षता का मतलब सिधा-अर्थ धार्मिक वेश्यावृति को ही मान लिया गया है।

Thursday, 19 January 2012

कभी कभी


कभी कभी

बिक्षुब्ध हो जाता है मन तेरे लिये
कभी-कभी।
आन्दोलित हो उठता है दिल तेरे लिये
कभी-कभी,
हरदम रहता हूँ ख्यालों में तेरे ही,
पर तुफान मचा देता कोई ख्याल
कभी-कभी।

सदन है कि तुम मेरी नहीं हो,
किसी की हो,
भुल जाता यह बात
कभी-कभी।
तोड़ दूँ सारे बंधन को
चला जाऊँ ’उस पार’ मन करता
कभी-कभी।

भर आता है दिल
याद आती हो जब कभी
मचल उठता है दिल तुम्हें पाने को
कभी-कभी।
आँसू बहा लेता
या लिखता एक कविता
कभी-कभी।


Friday, 16 December 2011

बाजार नारी का ही है!




बाजार नारी का ही है!
देह का बिकना आसान है
मोहक भी,
आनंद भी,
पैसा भी,
बाजार नारी का ही है
मांग भी है,
खरिददार की-
खुशामदी भी।

वे स्पर्श कर ही -
लुट जाते।
स्पर्श क्या
नारी का प्रदर्शन ही काफी है-
देह का।
पैसा ही नहीं,
शोहरत भी,
चहेतों का प्यार
भरपूर प्यार!
एक झलक पर-
लुट जाते
बस!
बाजार नारी का ही है!

देह को रखना है
बाजार में
अच्छे बाजार में
ऊँची दुकानो में
’मिस वर्ल्ड’
’मिस युनिवर्श’
और न जाने-
कितने खिताब भी
मिल जाते यूँ ही
सिर्फ दिखा कर देह!
बाजार नारी का ही है!

फिल्म,
मॉडलिंग
और अभिनय-
के बाजार में,
कला के नाम पर
खुब किती है
इनकी देह!
बाजार नारी का ही है!

वह मार्केट-
पुरूषों का कहाँ?
वह तो बस!
खरिददार ही रहा।
बेवकुफ!
लुटाता है
और बदनाम भी
वही होता है
’नारी शोषक’
जबकि शोषण-
तो उसी का होता है,
बदनाम भी वही करता है
पुरूष!
बाजार नारी का ही है!

डरपोक,
कंजुस,
कुठीत मर्द
बदनाम करते
सामाजिकता का
लबादा ओढ़े,
बेचारे मर्द!
मुफ्त हुये बदनाम!
मारे गये गुलफाम!!
बाजार नारी का ही है!
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Tuesday, 8 November 2011

आस्था



     ’’देखो भाई , अब मै कुछ नहीं कर सकता। इतना समझाने के बाद भी जज के सामने तुम्हारे पिता जी के बयान ने सब गुड़ गोबर कर दिया।’’ वकील की बात सुन कर बूढ़े ने कहा-

     ’’ हाँ रे, मैं भगवत गीता छू कर कसम खाकर कैसे झूठ बोलता ? मेरा हाथ सड़ नहीं जाता ?              धर्म-कर्म से भी बड़ा कुछ होता है ?’’

     ’’ हाँ बाबु जी, उसके सब गवाह किस तरह गीता पर हाथ रख झूठ पर झूठ बोलते गये, उन सबके हाथ कहाँ सड़  गये ? आपका ही हाथ सड़ता ? अरे यह तो केवल अदालत का नियम है नहीं तो गीता छू कर बयान देने के बाद भी क्यों नाना प्रकार के साक्ष्य की आवष्यकता पड़ती ? अदालत में आपने वकील के बताये बात को ही कहना चाहिये।’’

     ’’ नहीं बेटा, चाहे कुछ भी हो मैं धार्मिक पूस्तक पर हाथ रख कर झूठ नहीं बोल सकता।’’ पिता की बात सुन कर बेटा ने अपने वकील से झल्ला कर कहा-’’ वकील साहब, आखिर यह ढकोसला क्यों ? क्यों सीधे-साधे लोगों के धार्मिक आस्था के साथ खिलवाड़ किया जाता  है ? या तो धार्मिक किताब पर हाथ रख कर कही बात पर कोई जिरह न हो ,उसे ही सच मान लिया जाय ,वरना अदालत में यह ढकोसला बंद हो जाना चाहिये जिससे सीधे-साधे लोग सच बोल कर फंसते जाते हैं और चालाक-धूर्त्त लोग झूठ पर झूठ बोलकर बंचते जाते हैं ।’’

     ’’ यही सच और झूठ के ऊपर ही तो हम वकीलों की रोजी-रोटी  चल रही है। अरे तुम्हारे बातों से तो क्रांति की बू आती है।’’ वकील ने कहा।

मंदिर का चोर



     ’’कलुआ, तुम यह तो कहो कि अब तक जितनी बार तुम चोरी करते पकड़े गये हो हर बार किसी न किसी मंदिर में ही चोरी करते पाया गया है। इस बार भी तुम जैन मंदिर में सोना का कलश चोरी करते पकड़ा गया। आखिर तुम हर बार मंदिर में ही चोरी क्यों करते हो?’’

     जज ने उत्सुकता बस पुछा तो चोर ने गंभीर स्वर में कहा-

’’ मंदिर में सीधे-साधे लोगों से ठगी का धन जमा रहता है जिससे परखोक धर्माचारी लोग मौज करते हैं। नाना प्रकार के धार्मिक अंधविश्वास में फंस कर लोग दान-दक्षिणा देते हैं। मैं उसी धन से अपना हिस्सा वसूलता हूँ। देश के सभी मंदिरों में जमा धन सरकारी खजाने में जमा कर दिया जाय तो कितने ही बड़े-बड़े जनहित में कार्य हो सकते है। साथ ही साथ अंधविश्वासी लोगों को यह भी अहसास दिलाना चाहता हूँ,कि जो भगवान अपने घर (मंदिर) की रक्षा नहीं कर सकते वह दूसरे मनुष्यों की क्या रक्षा करेगा? इसलिये मेरे अनुसार मंदिर में चोरी करने में कोई बुराई नहीं है। मैं दूनिया के सब चोरों का आह्वान करते हूये कहना चाहता हूँ कि-
      ऐ चोर,चोरी करो मंदिर में,
 जहाँ घूसखोर भगवान।
   अमीर ही बढ़े गरीब ही मरे,
   पंडित मौज करे बेईमान ।।’’
चोर के मूह से यह धर्म की व्याख्या सुन सब चकित रह गये।