Friday, 16 December 2011

बाजार नारी का ही है!




बाजार नारी का ही है!
देह का बिकना आसान है
मोहक भी,
आनंद भी,
पैसा भी,
बाजार नारी का ही है
मांग भी है,
खरिददार की-
खुशामदी भी।

वे स्पर्श कर ही -
लुट जाते।
स्पर्श क्या
नारी का प्रदर्शन ही काफी है-
देह का।
पैसा ही नहीं,
शोहरत भी,
चहेतों का प्यार
भरपूर प्यार!
एक झलक पर-
लुट जाते
बस!
बाजार नारी का ही है!

देह को रखना है
बाजार में
अच्छे बाजार में
ऊँची दुकानो में
’मिस वर्ल्ड’
’मिस युनिवर्श’
और न जाने-
कितने खिताब भी
मिल जाते यूँ ही
सिर्फ दिखा कर देह!
बाजार नारी का ही है!

फिल्म,
मॉडलिंग
और अभिनय-
के बाजार में,
कला के नाम पर
खुब किती है
इनकी देह!
बाजार नारी का ही है!

वह मार्केट-
पुरूषों का कहाँ?
वह तो बस!
खरिददार ही रहा।
बेवकुफ!
लुटाता है
और बदनाम भी
वही होता है
’नारी शोषक’
जबकि शोषण-
तो उसी का होता है,
बदनाम भी वही करता है
पुरूष!
बाजार नारी का ही है!

डरपोक,
कंजुस,
कुठीत मर्द
बदनाम करते
सामाजिकता का
लबादा ओढ़े,
बेचारे मर्द!
मुफ्त हुये बदनाम!
मारे गये गुलफाम!!
बाजार नारी का ही है!
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Tuesday, 8 November 2011

आस्था



     ’’देखो भाई , अब मै कुछ नहीं कर सकता। इतना समझाने के बाद भी जज के सामने तुम्हारे पिता जी के बयान ने सब गुड़ गोबर कर दिया।’’ वकील की बात सुन कर बूढ़े ने कहा-

     ’’ हाँ रे, मैं भगवत गीता छू कर कसम खाकर कैसे झूठ बोलता ? मेरा हाथ सड़ नहीं जाता ?              धर्म-कर्म से भी बड़ा कुछ होता है ?’’

     ’’ हाँ बाबु जी, उसके सब गवाह किस तरह गीता पर हाथ रख झूठ पर झूठ बोलते गये, उन सबके हाथ कहाँ सड़  गये ? आपका ही हाथ सड़ता ? अरे यह तो केवल अदालत का नियम है नहीं तो गीता छू कर बयान देने के बाद भी क्यों नाना प्रकार के साक्ष्य की आवष्यकता पड़ती ? अदालत में आपने वकील के बताये बात को ही कहना चाहिये।’’

     ’’ नहीं बेटा, चाहे कुछ भी हो मैं धार्मिक पूस्तक पर हाथ रख कर झूठ नहीं बोल सकता।’’ पिता की बात सुन कर बेटा ने अपने वकील से झल्ला कर कहा-’’ वकील साहब, आखिर यह ढकोसला क्यों ? क्यों सीधे-साधे लोगों के धार्मिक आस्था के साथ खिलवाड़ किया जाता  है ? या तो धार्मिक किताब पर हाथ रख कर कही बात पर कोई जिरह न हो ,उसे ही सच मान लिया जाय ,वरना अदालत में यह ढकोसला बंद हो जाना चाहिये जिससे सीधे-साधे लोग सच बोल कर फंसते जाते हैं और चालाक-धूर्त्त लोग झूठ पर झूठ बोलकर बंचते जाते हैं ।’’

     ’’ यही सच और झूठ के ऊपर ही तो हम वकीलों की रोजी-रोटी  चल रही है। अरे तुम्हारे बातों से तो क्रांति की बू आती है।’’ वकील ने कहा।

मंदिर का चोर



     ’’कलुआ, तुम यह तो कहो कि अब तक जितनी बार तुम चोरी करते पकड़े गये हो हर बार किसी न किसी मंदिर में ही चोरी करते पाया गया है। इस बार भी तुम जैन मंदिर में सोना का कलश चोरी करते पकड़ा गया। आखिर तुम हर बार मंदिर में ही चोरी क्यों करते हो?’’

     जज ने उत्सुकता बस पुछा तो चोर ने गंभीर स्वर में कहा-

’’ मंदिर में सीधे-साधे लोगों से ठगी का धन जमा रहता है जिससे परखोक धर्माचारी लोग मौज करते हैं। नाना प्रकार के धार्मिक अंधविश्वास में फंस कर लोग दान-दक्षिणा देते हैं। मैं उसी धन से अपना हिस्सा वसूलता हूँ। देश के सभी मंदिरों में जमा धन सरकारी खजाने में जमा कर दिया जाय तो कितने ही बड़े-बड़े जनहित में कार्य हो सकते है। साथ ही साथ अंधविश्वासी लोगों को यह भी अहसास दिलाना चाहता हूँ,कि जो भगवान अपने घर (मंदिर) की रक्षा नहीं कर सकते वह दूसरे मनुष्यों की क्या रक्षा करेगा? इसलिये मेरे अनुसार मंदिर में चोरी करने में कोई बुराई नहीं है। मैं दूनिया के सब चोरों का आह्वान करते हूये कहना चाहता हूँ कि-
      ऐ चोर,चोरी करो मंदिर में,
 जहाँ घूसखोर भगवान।
   अमीर ही बढ़े गरीब ही मरे,
   पंडित मौज करे बेईमान ।।’’
चोर के मूह से यह धर्म की व्याख्या सुन सब चकित रह गये।

Tuesday, 25 October 2011

भ्रमित स्वामि राम देव!


हे योग के
व्यवसायी बाबा
राम देव,
राजनीति के मर्म
आप जानते है,
उससे अधिक
व्यवसायिक मर्म को
इसलिये तो -
योग शिविर में
गेरूवे आवरण को चूना।

योग का सरलीकरण कर
खुब जुटाया
धन भी जन भी
पर,
हे भ्रमित स्वामि जी,
योग शिविर के भीड़
योग के प्रति उत्सुक हैं
आपके प्रति नहीं।

योग शिविर के आगंतुकों को
अपना ’वोटर’ समझना
आपका भ्रम है,जैस-
हेमा मालिनी और शस्त्रुघ्न के
चूनावी सभा के भीड़
भाजपा के मतदाता नहीं होते
कांग्रेसी गोविंदा के
ठूमकों पर फिदा यूवा
कांग्रेसी ही नहीं होते
वैसे ही
योग शिविर के भीड़ सभी
आपके अनुयायी नहीं होते।

राजनीति बुरी नहीं है
जैसा कि प्रचार किया जाता
बल्की राजनीति तो सर्वोपरि है
डॉक्टर, वकील, इंजिनियर
वैज्ञानिक, कलाकार या बाबा
सबसे ऊपर होता देश
और देश के विधाता नेता।

नेता अच्छा,
तो नीति अच्छा।
नीति अच्छा,
तो ब्यवस्था अच्छी
ब्यवस्था अच्छी तो राज्य सुखी
जनता सुखी, सुरक्षित!

चूनावी राजनीति में
जनता की जिम्मेदारी पहली है।
नेता जनता के प्रतिनिधि होते,
गलत जनता!
गलत नेता।
भ्रष्ट्र जनता!
भ्रष्ट्र नेता।

आप नेता को क्यों कोसें?
असली दोषी तो जनता है।
बहुदलिय चूनावी राजनीति मे
बहूमत को आकर्षित करना
सबकी राजनैतिक चूनौति है।

दिकभ्रमित, अशिक्षित, मजबूर, गरीब
निरूपाय और आकांक्षी-
जनता को शिक्षित करना
ईमानदार नेता की चूनौति है।

पहले भी बहुत आये बाबा
जिसने राजनैतिक बयान ही नहीं दी
ब्यवस्था को प्रभावित किया
जनता को ’बहकाने’ के चलते
सत्ता ने जहर पिलाया
सुकरात को ?
रजनीश तो इसी युग में हुए
जिसने अमेरिका को भी डराया
तुम अरस्तु बन सकते हो
चाणक्य बन सकते हो
सोनिया भी बन सकते हो
पर-
सिकंदर या चंद्रगुप्त नहीं
आज का सिकंदर
 निरिह अशिक्षित
बहुसंख्य भ्रष्ट्र जनता है।

हे जनतंत्र के शुभचिंतक!
खुब भाषण दो
अच्छा भाषण दो
उन्हें शिक्षित करो
इमानदार बनाओ
इस योग्य बनाओ
ऐसी शिक्षा दो
कि-
अपने वोट की किमत जान सके
चंद तात्कालिक लोभ को
संवरन कर सके
एक बोतल दोरू,
दो टूकड़े मांस
या चंद नकदी में
अपना मत किसी गलत -
धूर्त्त नेता को न दे।

पहचान कर सके
अच्छे विचारधारी की-
परख कर सके
इमानदार राजभक्त
नेता का चूनाव कर सके।

भारत को ऐसे ही रहनुमा की
तलाश है,
जो खूद विधायक या सांसद
न बन कर भी
सही नेता की चुनाव में
अपनी ऊर्जा लगा सके।
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समाज में बेटा बेटी की जरूरत पर एक कविता

अगर एक बेटी या बेटा होता,
दुनीयाँ में ये नाता न होता ।

माँ भी होती बाप भी होता,
न भाभी होती न भैया होता,
गर मैं भी अकेला होता,
बहन होती न जीजा होता।

दादी होती दादा भी होता,
न चाची होती न चाचा होता,
गर मेरा बाप अकेला होता,
फुफी होती न फुफा होता।

नानी होती नाना भी होता,
न मामी होती न मामा होता,
गर मेरी माँ अकेली होती,
मौसी होती न मौसा होता।

सास भी होती ससुर भी होता,
न साली होती न साला होता,
गर मेरी बीबी अकेली होती,
मैं भी किसी का जीजा न होता।

अगर एक बेटी या बेटा होता,
दुनीयाँ में ये नाता न होता !!

Sunday, 16 October 2011

लक्ष्मण तुम जंगल क्यों गये?


वन जाने का आदेश
राम को ही हुआ था
सीता कां संग जाना
पती प्रेम तो था,
पर
लक्ष्मण तुम जंगल क्यों गये?
नई नवेली पत्नि
उर्मीला को छोड़?
भाई का प्रेम था
या कुछ और ?
पति का कर्त्तव्य छोड़
लक्ष्मण तुम जंगल क्यों गये?

अगर कहूँ
भाई के प्रेम नहीं
सीता का आकर्षण था
तेरे वन को जाना!
याद करो!
विश्वामित्र के साथ
सीता स्वयंवर में जाना
पूष्प वाटिका में मिलना।

जनक के निराश भरे शब्दों पर
बार-बार तेरा
धनुष भंग केलिए उठना।
मजबूर थे,
विश्वामित्र ने राम को उठाया।

जो काम कर सकते थे
छोटा लक्ष्मण
राम को क्यों उठाया?

घर पहूँच कर भी
उर्मीला को नहीं अपनाया
सीता को ही अपने
अंतस में बसाया।

सीता ने पत्नि धर्म निभाया
पर राम ने पति से अधिक
राज धर्म निभाया।
जनता के बात पर
पत्नि को ठुकराया।

तुम्हारी मंसा तो
सीता भी समझ ली थी
स्वर्ण मृग के चक्कर में
जब राम न वापस आये
लक्ष्मण कह पूकारा
लक्ष्मण के न जाने पर
सीता ने क्या कहा था?

हे लक्ष्मण राम को
वनवास हुआ
सीता पति संग हो ली
तुमने क्या किया
अपनी पत्नि को छोड़ घर मे
सीता का चक्कर लगाया
बोलो लक्ष्मण या सच नहीं?
तो
लक्ष्मण तुम जंगल क्यों गये?
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Saturday, 17 September 2011

इंसानियत



क्यों हो जाता कोई इंसान
इसाई, हिन्दू या मुसलमान!

गर सदाचार का पाठ पढ़ाते
बाइबल, गीता र्कुआन
फिर क्यों धर्म के नाम पर इंसान
हो जाता हैवान ?

हत्या हो रही हिन्दू की
जलाये जा रहे मुसलमान
न बचाने आता कोई खुदा
न रक्षा करता भगवान
फिर क्यों पुकारता नादान
ऐ खुदा या हे भगवान ?

दुनियाँ में ये धर्म न होते
मंदिर मस्जिद चर्च न होते
कम से कम इंसान रह पाता
एक खालिस इंसान
न होता कोई सिख, इसाई
हिन्दू ना मुसलमान।

इंसानियत



क्यों हो जाता कोई इंसान
इसाई, हिन्दू या मुसलमान!

गर सदाचार का पाठ पढ़ाते
बाइबल, गीता र्कुआन
फिर क्यों धर्म के नाम पर इंसान
हो जाता हैवान ?

हत्या हो रही हिन्दू की
जलाये जा रहे मुसलमान
न बचाने आता कोई खुदा
न रक्षा करता भगवान
फिर क्यों पुकारता नादान
ऐ खुदा या हे भगवान ?

दुनियाँ में ये धर्म न होते
मंदिर मस्जिद चर्च न होते
कम से कम इंसान रह पाता
एक खालिस इंसान
न होता कोई सिख, इसाई
हिन्दू ना मुसलमान।

Tuesday, 13 September 2011

’प्रेम-पुजारी’ से


                                          ’प्रेम-पुजारी’  से

समाज की सबसे महत्वपूर्ण संस्था है विवाह। विवाह और कुछ नहीं दो नर नारी के शारिरिक संबंध की सामाजिक मान्यता है। मानव समाज में पशुगत सहज काम वृति पर अंकुश लगाने और परिवार का निमार्ण करने हेतु ही विवाह की आवश्यकता महसुस की होगी। प्रेम की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं है। कोई कहता है प्रेम अंधा होता है, कोई कहता है प्रेम में त्याग होता है, कोई प्रेम को ईश्वर से तुलना कर बैठता है तो कोई इसे समाज की उत्श्रृंखलता करार देता है।

समाज में आये दिन जवान लड़का-लड़की के प्रेम के चक्कर में मौत की खबर मिलती रहती है। यह खबर किसी को नहीं गुदगुदाता यह उसी प्रकार सहज और सरसरी तौर पर सिर्फ समाचार शिर्षक पढ़ आगे बढ़ने जैसी ही होती है जैसे आये दिन होने वाली सड़क दूर्घटना की खबर। लेकिन जब यही प्रेम का चक्कर किसी चर्चित व्यक्ति के साथ हो तो समाचार नजर गड़ा कर पढ़ने लायक हो जाती है। पिछले बार जब छत्तीस गढ़ के बड़े नेता अजित जोगी की बेटी प्रेम प्रसंग में मौत हुई तो देश भर में चर्चा हुई। अभी हाल में झारखंड के कोडरमा के एक साधारण परिवार की लड़की की मौत हुई प्रेम प्रसंग में और वह अखबार तथा टी0वी0 चैनलों में सुर्खीयाँ बटोरी हुई है। भला क्यों न हो वह भले एक बड़े नेता या उद्योगपति की बेटी न हो वह थी तो एक पत्रकार ही और उसके प्रेमि भी तो ठहरे पत्रकार और भला अपने ही बिरादरी के पक्ष में तमाम अखबार और चैनल क्यों न खड़े हों? उन्हें तो चाहिये एक लोक रूची का ऐसा मशाला जिसे चाहे जितने चटखारे के साथ परोसा जाय।

कहा जाता है कि भगत सिंह परोस में पैदा हो। अर्थात भगत सिंह जैसा जोखिम भरा काम कोई अपने बेटे से नहीं करवाना चाहता। उसी प्रकार जब समाज में किन्हीं प्रेम प्रसंग की चर्चा होती है तो तमाम पत्रकार और सामाजिक कर्त्ता प्रेम-पुजारी हो जाते हैं और उसके पक्ष में बयान देना आरंभ कर देते हैं। उस लड़के या लड़की के माता-पिता और परिजन को ’विलेन’ के रूप में रख आलोचना करना शुरू कर देते हैं। उसी तरह जैसे परोस के क्रांतिवीर भगत सिंह की तारिफ करते नहीं थकते। मैं उन तमाम पत्रकारों से पुछना चाहता हूँ कि वे अपने भाई, बहन और बेटे बेटियों को क्या इसी प्रकार छुट देंगें जैसा कि वकालत किन्हीं प्रेम प्रसंग के संदर्भ में अपने विचार व्यक्त करते हैं ? अपवाद को छोड़ कर इसका जबाब नकारात्मक आयेगा। और अपवाद से समाज नहीं चलता।

एक मा-बाप कितने ही लाड़ प्यार और कठिनाई से बच्चे हो पाल पोस कर बड़ा करता है, उसे उच्च शिक्षा केलिए कितने आकांक्षाएँ संजोये बाहर भेजता है।  अपने बच्चे के प्रति क्या केवल कर्त्तव्य निर्वाह के ही पक्षधर हैं आप ? क्या माता-पिता का अपने बच्चों से मान-सम्मान की अपेक्षा करना गलत है ? अगर ऐसा है तो फिर क्यों कोई माता-पिता अपने बच्चे के ऊपर इतना कुछ करे ?

समाज में प्रेम विवाह शुरू से होते आया है लेकिन सब दिन उसे असामान्य रूप में ही देखा गया है भले बाद में कुछ विवाह सफल भी हो जाते हैं। बिना माता-पिता के सहमति से विवाह किसी दृष्टि से सामाजिक नहीं है और बस चले तो माता-पिता को वैसे बच्चे से अपने को न केवल सामाजिक रूप से अलग कर लेना चाहिए वरन वैसी कानुनन अधिकार होना चाहिए कि वे अपने उन नालायक बच्चे से उसके उपर किये खर्च की वसुली भी कर सके।

मैं तमाम ’प्रेम-पुजारी’पत्रकार बन्धुओं से पुछना चाहता हूँ कि वे प्रेम, उत्श्रृंखलता, आवारार्दी, ऐयास्सी और बचपना में फर्क करना सिखें। अगर सहज पशुगत आकर्षण को ही प्रेम की संज्ञा दे दी जाय तो फिर एक आवारागर्द बलात्कारी को कैसे गलत कह सकते हैं ? वह भी तो सहज आकर्षण में आकर ही बलात्कार करता है। और आदिम काल में बलात्कार कोई अपराध नहीं माना जाता था। क्या आप समाज को वैसी ही आदिम युग की ओर ढकेलना चाहते हैं ?

हालफिलहाल में घटित एक ऐसे प्रेम-प्रसंग की चर्चा करना चाहता हूँ जो किसी अखबार में नही छपी है। एक लड़की एक दस बर्ष पूत्र के पिता के साथ भाग जाती है और कई दिनों के बाद उस मर्द के साथ घर लौटती है। खबर पाकर उसकी पत्नी और परिजन लड़की के यहाँ आते हैं लड़की को छिपा कर लड़के को भगा दी जाती है। पत्नी पूलिस में रपट लिखवाती है अपने पति के साथ उस लड़की और उसके बाप-भाई के खिलाफ। पुलिस लड़का-लड़की को पकड़ जेल भेज देती है और लड़की के बाप-भाई पुलिस के डर से मारे-मारे फिरते रहे जब तक की उनकी बेल न हो गया।

इतना कुछ होने के बाद भी लड़की के बाप और भाई को लड़की के प्रति शिकायत नहीं और    वे लड़की से दुरी बनाये रखने का दिखावा केवल इसलिए कर रहे हैं क्यों कि कोर्ट में केस है। पत्रकार      बंधु आप के नजर में शायद यह एक आदर्श पिता का उदाहरण होगा इसलिए इसकी चर्चा की।

लड़के-लड़कियों में यह उदंडता और उसका आप जैसे बुद्धिजिवि का समर्थन समाज में क्या संदेश दे रहा है इसका भी आंकलन करें आप, कि कैरियर और स्टेटस के चक्कर में यह हम भुल जाते हैं कि सेक्स एक सहज वृति है और एक उम्र के साथ इसकी भी आवश्यकता पड़ती है जिसे हर कोई कविता लिखकर पेंटिंग कर अथवा योग-ध्यान कर तो दबा नहीं सकता उसका सहज प्रदर्शन तो एक विपरित लिंगी के साथ ही संभव है और वह सामने जो मिल जाय। जब कोई पारिवारिक रूकावट न हो तब तो इसे परवान चढ़ना आसान हो ही जाता है। अब माता-पिता क्या फिर बाल विवाह की ओर उन्मुख हों ?

बिना लाग लपेट के एक बात साफ-साफ कहना चाहता हूँ कि एक बच्चे को नवजात अवस्था से लेकर उच्च शिक्षित करने में एक मा-बाप जितना कुछ करता है उसमें प्रेम और त्याग दोनो समाहित रहता है और साथ ही अपेक्षा भी कि वह उसका नाम रोशन करे वैसे में कोई एक लड़की या लड़का के ’प्रेम’ में पर पच्चीस-तीस बर्ष के मा-बाप के प्यार को भुला कर उसके सामाजिक प्रतिष्ठा को धता बता कर एक चंद दिन से संपर्क में आये ’प्रेमि’ के साथ हो ले यह कैसा न्याय है ? माता-पिता को ऐसे नालायक पुत्र या पुत्री को जहर देकर मारने का कानुनन हक होना चाहिये जिस जगह उसे आज गुनाहगार ठहराया जा रहा है।एक बार उनके माता-पिता के भावनाओं को भी समझने का जहमत उठायें।

वासना और आकर्षण में की गई नादानी को ’प्रेम’ कह कर उसे प्रोत्साहित करना सामाजिक अपराध है जिसकी सजा भारतीय संविधान में नहीं है। कमसे कम ऐसे घटना पर टिपण्णी करते वक्त उसे अपने और अपने परिवार के सदस्य को सामने रख देख लें कि क्या ऐसा ही घटना अपने ऊपर घटित होने पर आप क्या प्रतिक्रिया करेंगे ?

’आकाश खूँटी’

Saturday, 10 September 2011

नारी केवल तुम बला हो!


ईश्वर की अधुरी कला हो,
कौन कहे अबला तुमको,
हो तुम इतनी सबला कि-
कौन पुरूष न तुमसे छला हो,
नारी केवल तुम बला हो!

प्रकृति से संतुष्ट नहीं तुम
कर ’भ्रू-प्लग’ लगा मेकप
पहने लिबास भड़कीला हो
फिर क्यों न पुरूष मनचला हो
नारी केवल तुम बला हो!

अनी नग्न तस्विर बेंचती
’ब्यूटि-कंटेस्ट’ के बहाने
जीस्म की नुमाइस करती
फिर क्यों न पुरूष मतवाला हो
नारी केवल तुम बला हो!

ममता, करूणा, सलज की मुर्त्ती
होतीं हैं जो होती बेचारियाँ
हो जाती उत्श्रृंखल नारी,
जहाँ पुरूष का वश न चला हो
नारी केवल तुम बला हो!

हाय! पुरूष हृदय उदार,विशाल
उपेक्षित हो भी तुझे कही प्रेरणा
विश्वास किया जीस पुरूष ने
उसके जीवन में जलजला हो
नारी केवल तुम बला हो!

ईश्वर और प्रेम



प्रेम का जब जक्कर चलता है
साथ-साथ मंदिरों और तां़ित्रको के भी-
चक्कर चलता रहता है।
वह पूजा, आराधाना, ध्यान-त्राटक-
सब करता है,
 प्रेम पात्र के लिये।
अगर प्रेम-पात्र को
 पाने में सफल हुआ,
तो वह आस्तिक हो जाता है।
समझता है-
यह ईश्वर का ही चमत्त्कार है,

अगर वह प्रेम पात्र को पाने में
 असफल रहा-
तो वह नास्तिक हो जाता है,
उसे मंदिरों और तांत्रिकों का चक्कर लगाना,
ध्यान और त्राटक करना व्यर्थ लगता है,

ईश्वर से उसकी आस्था मिट जाती है।

प्रेम में सफलता और असफलता-
ईश्वर की आस्था से
जोर कर देखा जाता है,
इसलिये कहते हैं-

’ईश्वर प्रेम है’ या ’प्रेम ही ईश्वर है।’

Friday, 9 September 2011

नारी स्वतंत्रता

नारी स्वतंत्रता

नारी माँ होती है
नारी बहन होती है
नारी बीबी होती है
नारी बेटी होती है
नारी प्रेमिका होती है
नारी पड़ोषण होती है
कई और भी रूप हैं नारी के।
माँ नारी होती है
बहन नारी होती है
बेटी नारी होती है
बीबी नारी होती है
पड़ोषण नारी होती है
कुछ और भी नारी होती हैं।
हे नारी स्वतंत्रता के-
हिमायति पूरूष!
किस नारी की बात करते हो?
किसी की माँ
किसी की बहन
किसी की बेटी
किसी की बीबी
किसी सह-कर्मि
किसी पड़ोषण-
से सानिध्य की चाहत
सानिध्य में रूकावट के वक्त -
नारी स्वतंत्रता की आवश्यकता-
महसूस होती है।
तब मुझे लगता है-
दूनियाँ की सारी बेटियाँ स्वतंत्र हों!
शिवाय मेरे।
दूनियाँ की सारी बहने स्वतंत्र हो!
शिवाय मेरे।
दूनियाँ की सारी पत्नियाँ स्वतंत्र हो!
शिवाय मेरे।
हम बेटी की स्वतंत्रता की बात करते हैं-
सास-ससूर के जब अधिन होती है।
हम बहन की स्वतंत्रता की बात करते हैं-
जब वह सास और जेठानी के अधिन होती है।
हम बीबी की स्वतंत्रता कभी नहीं चाहते!!

नारी क्यों सजती हो?

नारी क्यों सजती हो?
ये मेक-अप, ये काजल
ये लिपिस्टीक और-
ये गोपन अंगों को
उभारने वाले कपड़ें-
क्यों पहनती हो?
पूरूष केलिये ही न?
व्यूटिपार्लर जाना
यह सजना और संवरना
किसके लिये?
पूरूष के लिये ही न?
भड़किला चटकिला देख
सिटी बजायी लड़के ने-
क्या बुरा किया?
सच तो यह है-
कि, तु खुश होती उस सिटी से,
जैसे हो गई सार्थक -
तुम्हारा व्यूटिपार्लर जाना।
हे नारी स्वतंत्रता के घोषक
नारी उत्श्रृंखलता के पोषक
तु पूरूषों से बराबरी की बात-
करती है तो तरस आती है।
जब तक उसके लिये
सजती रहेगी
उसे रिझाने का यत्न
करती रहेगी
इस तरह हे नारी
तु उत्श्रंृखल ही हो पायेगी
न स्वतंत्र हो पायेगी
न कर पायेगी बराबरी-
पूरूषों से।
हे नारी!
तु सजना छोड़
या सजना छोड़
क्यों कि-
सजना तो है सजने के लिये
सजना तो है सजने के लिये।।

GOOD IS GOD BUT , GOD IS NOT GOOD!

 I THINK ALL GOOD MAY BI  LIKE 'GOD' MEANCE, BUT NO ANY RELIGIOUS 'GOD' NAVER GOOD FOR HUMEN.